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सर पर खड़ी मौत से बेखबर थी यह औरत, देखें वीडियो!

निरंतर पर्व मनाना कोई हिंदुस्तानियों से सीखे। पर्व यानी प्रवाहित होते काल के किसी खास पड़ाव का महोत्सव। और सावन में जब देवशयनी एकादशी के साथ लगभग सारे देवता सोने चले जाते हैं, तो अविनाशी काल के प्रतीक भोलेनाथ

के भक्तों की बम बम हो जाती है। शिव की प्रिय नदी है गंगा जिसे उन्होने गंगा के धरती पर उतरने के वक्त अपनी जटाओं में धारण किया और उसका पानी उनको बहुत प्रिय माना गया। लिहाज़ा शिव के प्रिय महीने श्रावण में सप्ताह में शिव के प्रिय दिन सोमवार को किसी तीर्थ से गंगाजल ला कर शिव का अभिषेक कराना शिवभक्तों का प्रिय उत्सव बना।

 

माना जाता है कि अपने कंधों पर गंगाजल और शिव का ज्योतिर्लिंग एक कांवड़ पर ला कर रावण (जी हां शिव के वे त्रेतायुगीन भक्तों में सबसे सीनियर रहे) ने झारखंड के वैद्यनाथ धाम और कर्नाटक के गोकर्ण में शिवलिंग पर चढ़ाया और शिव को प्रसन्न किया। पर बेचारे का नसीब कुछ खोटा था। दोनो बार भारत भूमि से उड़ा कर लाये शिवलिंग को दशानन भारत से लंका न ले जा पाये।

तनिक सा आराम करने को शिवलिंग की कांवड़ धरती पर रखी तो शिवलिंग वहीं जम गया। पहली बार वैद्यनाथ धाम में, दोबारा कर्नाटक में। लोकल्लो बात ! रावण ने अपने दसों सर काट कर वैद्यनाथ धाम को चढ़ाए।

शिव ने वैद्य बन कर उनको फिर जोड़ दिया। इससे शिव का वह धाम वैद्यनाथ (उर्फ बैजनाथ धाम ) तो कहलाया पर शिव न हिले तो न हिले। यही कर्नाटक में रिपीट हुआ। रावण ने ज़ोर से खींचा तो शिवलिंग गाय के कान जैसा हो गया पर उठाया न गया। सो वह धाम गोकर्ण तीर्थ बन गया।

 

 

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