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इस औरत ने धान के खेत में मारने के लिए जो किया देखकर आपके होश उड़ जाएंगे

खेती-किसानी का हमेशा से प्रकृति से एक घनिष्ठ संबंध रहा है तो लोकगीतों का आदिवासी संस्कृति और परंपरा में अपना अलग महत्व हैं। सामाजिक सांस्कृतिक वातावरण से घनिष्ठ जुड़ाव लोकगीतों की एक प्रमुख विशेषता रही है।

यह जुड़ाव ही है जो श्रोताओं के मस्तिष्क पटल पर गहराई से छाप छोड़ता है और जिसमें श्रोतागण अपने सुख-दुःख के अनुभव की गाथा को टटोलने का प्रयास करते हैं। प्रायः अन्नदाता वर्ग की मनःस्थिति कृषिगत

कार्यकलापों तथा पारिवारिक जीवन की दुश्वारियों के इर्द-गिर्द ही रमती रहती है। लोकगीतकार कृषक समाज की मनःस्थिति से भलीभांति परिचित होता है जिसकी झलक विरहा, रोपनी, व मल्हार आदि लोकगीतों में बखूबी देखने को मिलती है।

ग्रामीण महिलाएं परम्परागत रूप से कृषि कार्य में दक्ष होती हैं। वे कृषि कार्य में पूर्णतया समर्पित तथा एकाग्रचित होने के लिए लोकगीतों को गुनगुनाती हैं। प्रायः महिलाएं जब धान रोपने तथा निर्वाही करने खेत में जाती हैं,

तो अपनी व्यथा (पारिवारिक जीवन की कटुता, प्रेम आदि) व आकांक्षाएं (गहने, जेवरात, शहर व तीर्थ दर्शन आदि) ‘रोपनी’ व ‘सोहनी’ नामक गीत से व्यक्त करती हैं। पश्चिम बंगाल के बांकुरा से एक साथी ने ऐसे ही ढोल की

थाप व लोकगीतों की धुन पर धान की रोपाई करती आदिवासी महिलाओं की वीडियो भेजी है जो बरबस ही हर किसी का मनमोह लेती है। वीडियो में पुरुष किसान एक विशेष पारंगत लय में ढोल बजा रहा है तो महिलाएं लोकगीत गाते हुए धान की रोपाई कर रही हैं।

 

 

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